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चित्रचिट्ठा
Friday, 9 May, 2008
अब ये साथ न छूटे
हिम ढँका तन, प्यार भरा मन
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श्री गणेशाय नमः
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जी.के. अवधिया
मैं एक संवेदनशील, सादे विचार वाला, सरल, सेवानिवृत व्यक्ति हूँ। मुझे अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व है। आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही मेरी उत्कृष्ट अभिलाषा है।
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(12)
ऊगले साड़ी
अगली पीढ़ी के बच्चे
लुत्फ चांदनी रात का
अब ये साथ न छूटे
मिले जो ऐसी राह तो किसे हो मंज़िल की चाह
बूढा बरगद
उड़ान
पैचान कौन ?
तो आप यहाँ है शेर की मौसी जी
खिल गए गुलाब
ये पर्वतों के दायरे ......
वीणा वादिनी नमः
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